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बस स्टैंड में ऐसा है “चच्चा” का दबदबा, नियम-कानून और कार्रवाई सब खा रहे गच्चा

 


शहडोल। सादिक खान 

शहडोल। शहर के बस स्टैंड में फैली अव्यवस्था और चरमराई यातायात व्यवस्था को सुधारने के नाम पर नगरपालिका की कार्रवाई एक बार फिर सवालों में घिर गई है। अमले ने बस स्टैंड के मुख्य गेट के बाहर छोटे ठेले और खोमचे हटाकर कार्रवाई का दिखावा तो किया, लेकिन अंदर वर्षों से जमे रसूखदार बस संचालकों पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। स्थानीय लोगों का कहना है कि बस स्टैंड के भीतर खासतौर पर नफीस कंपनी का ऐसा दबदबा बना हुआ है कि नियम, कानून और प्रशासनिक व्यवस्था सब उसके आगे बौने नजर आते हैं।

सूत्रों के मुताबिक बस स्टैंड परिसर में बसों के लिए निर्धारित बे बनाए गए हैं, जहां बसों को रवाना होने से कुछ समय पहले ही खड़ा किया जाना चाहिए, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। आरोप है कि नफीस कंपनी की कई बसें घंटों नहीं बल्कि पूरे दिन और कई-कई दिनों तक एक ही स्थान पर कब्जा जमाए खड़ी रहती हैं। इससे अन्य बस संचालकों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है, वहीं यात्रियों की आवाजाही भी प्रभावित होती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बस स्टैंड अब यात्रियों की सुविधा का केंद्र कम और कुछ प्रभावशाली बस ऑपरेटरों का निजी अड्डा ज्यादा बन चुका है। आरोप है कि नफीस कंपनी के रसूख के चलते जिम्मेदार विभाग कार्रवाई से बचते नजर आते हैं। नगरपालिका और संबंधित विभाग केवल छोटे दुकानदारों और कमजोर तबके पर कार्रवाई कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, जबकि बस स्टैंड के भीतर फैली स्थायी अव्यवस्था और बसों के कब्जे पर आंखें मूंद ली जाती हैं।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बस स्टैंड को निजी गैराज की तरह इस्तेमाल करने वाली बसों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती। यदि नियम सभी के लिए बराबर हैं तो फिर नफीस कंपनी की बसों को विशेष छूट क्यों दी जा रही है।

हैरानी की बात यह है कि लगातार हादसों के बाद भी जिम्मेदार विभाग सबक लेने को तैयार नहीं हैं। कुछ समय पहले बेलगाम बस की चपेट में आने से एक पुलिसकर्मी की मौत हो चुकी है, वहीं दो बसों के बीच दबकर एक बस कर्मचारी ने भी जान गंवाई थी। हाल ही में बस स्टैंड परिसर की छत गिरने से दो लोग घायल हुए, जिनमें एक को गंभीर चोट आई। इसके बावजूद बस स्टैंड की व्यवस्था सुधारने की बजाय कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित नजर आ रही है।

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